रहमतें बहोत की है खुदा ने मुझ पर

रहमतें बहोत की है खुदा ने मुझ पर
फिर भी ना जाने क्यों डर लगता है
गुल है, गुलशन है, गुलफाम है अपने पास
फिर भी ना जाने क्यों मन दर्द में सना रहता है
वो है, उसकी मोहब्बत है और वफाई हैं
फिर भी न जाने क्यों मन बेचैन रहता है
कभी गम और ग़मगीन होना
कभी खुश और खुश नसीब होना
ये तो जीवन चक्र हाँ सबका
फिर भी ना जाने क्यों ऐतराज रहता  है
मुक्कर है जो तक़दीर में अपने
बदल सकता नहीं कोई
फिर भी ना जाने क्यों यकीं नहीं रहता हैं
फ़िजा है, मौसम है, महफ़िल हैं, मुस्कान हैं 
फिर भी ना जाने क्यों मन मायूश रहता है 
मंदिर है , मस्जिद है , मकान हैं अपना
फिर भी ना जाने क्यों शुकूं नहीं रहता
दोस्त है , मुहब्बत हैं और दास्ताँ भी है अपना
फिर भी ना क्यों शिकायत बनी  रहती है

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