"महात्मा गांधी"
सत्य अहिंसा के व्रत धारी
मानव प्रेम के प्रबल पुजारी
भारत माँ थीं जिनको प्यारी
हम सब हैं उनके आभारी
शस्त्र अहिंसा का वो अपनाये
बारूद , बंदूख न तलवार चलाये
फिर भी अंग्रेजो को मार भगाये
देश प्रेम के अमर पुजारी
हम सब है उनके आभारी
जो सहज नहीं अदभुद मानव था
लाठी पर खुद को ताने था
जो देश स्वतंत्रता के खातिर
बार अनेक आमरण अनशन ठाने था
वो थे सचमुच सत्यव्रत धारी
हम सब हैं उनके आभारी
- राजेश त्रिपाठी
"गरीबी"
उसके साये मेरे आस पास
भटकने लगे
हर पल हर समय
वह मुझे दिखायी
पड़ने लगी
मुझको एक अजीब सा एहसास
होने लगा
शायद वह मेरी तरफ
खींची आ रही थी
या यूँ कहूं
मैं उसके तरफ बढ़ने लगा
तो शायद कोई भेद नहीं होगा
मुझे चिंता होने लगी
आने वाले दिनों की
क्या ? मैं उसी तरह
रह पाउँगा
शायद नहीं
मेरे पास तो बच्चे है
मृद भाषी पत्नी हैं
क्या ? ये लोग झेल पायंगे
इस बढ़ी चली आ रही गरीबी को
या रो पड़ेंगे
क्या ? उनका रोना सही होगा
शायद नहीं
तो क्या और कोई विकल्प है
हाँ समझौता और कर्मनिष्ठा
- राजेश त्रिपाठी
"आतंकवाद"
पाक तेरी औकात क्या तेरी धज्जी उड़ा देंगे
करगिल क्या इस्लामाबाद तक हलचल मचा देंगे
आतंक से न डरा इसे इक पल में मिटा देंगे
कश्मीर ही नहीं केवल, आतंक को पुरे विश्व से मिटा देंगे
मेरी शांति को कमजोरी न समझ ये न पाक
हम अपना रुद्रा रूप भी दिखा देंगे
लिख देंगे वीर गाथा इतिहास में
शौर्य क्या है अपने वीर जवानो के मिशाल दिखा देंग
पाक तेरी औकात क्या तेरी धज्जी उड़ा देंगे
- राजेश त्रिपाठी
"दर्द"
मैं अश्क का वो दमन हूँ
जिसमे पानी का कोई बूंद नहीं
मैं उस चमन का माली हूँ
जिसमे फूलों और काँटों में कोई भेद नहीं
वाकई मैं हसता हुआ दर्द हूँ
जिसमे आन्नद की कोई कमी नहीं
मैं धुप में खड़ा बेहये का वृक्ष हूँ
जिसके हरे पन में कोई कमी नहीं
मैं कोई अजनबी नहीं
खुशी का प्रथम पद दर्द हूँ
मैं अश्क का वो दमन हूँ
जिसमे पानी का कोई बूंद नहीं
- राजेश त्रिपाठी