"उचित की मांग"
उनके आने के बाद
मैं नहीं कह सका
क्या मिलने के बाद
कह पाउँगा
वो कह रहे थे
और मैं सिर्फ
सुन रहा था
कहीं सुन रहा था
का मतलब
मुझे कुछ कहना नहीं था
या मेरा कुछ कहना
उचित नहीं था
शायद मेरा कहना
उचित नहीं था
लेकिन उनको तो
उचित करना था
उनके सब कुछ
कर डालने के बाद
की अब...
सब कुछ सुनने के बाद
सोचना चाहिए या
फिर सोचना छोड़ कर
कुछ करना चाहिए था
कि उनका करना
गलत नहीं था
या मज़बूरी में
गलत करना पड़ रहा था
या फिर उनका करना
सही था
शायद उनका करना
सही है के बाद
दोनों का तुलना
करना सही होगा
के बाद
फिर भी सही नहीं था
-राजेश त्रिपाठी
"जीविका"
वही आवाज आज भी
मुझे सुनाई पड़ रही थी
मैं फिर बहुत ध्यान मग्न था
फिर खो गया था उसी में
वो आवाज मुझसे फिर
उसी तरह बातें कर रही थी
जो की पहले
कई बार कर चुकी थी
आखिर मुझे विवश होना पड़ा
उस खिड़की के पास तक जाने पर
देखा की एक आदमी
धमकी दे रहा था
थप्पड़ जानते हो
पलट दूंगा ठेले को
शयद वो बच्चा
कुछ कहना चाहता था
लेकिन चुपचाप आगे बढ़ने लगा
अपने जीवन के सौंदर्य प्रसाधन
आलू , टमाटर और मिर्च को
ठेले पर रख्खे हुए
- राजेश त्रिपाठी
English conversion:
"Living"
The same voice still
I was heard
Then lost in the same
That voice me again
Was talking the same way
Before that
Had done so many times
After all, I was forced
To move till near that window
Saw that a man
Was threatening
You know Slap
Will turn jamming
Maybe that baby
Wanted to say something
But silently started moving forward
With his life cosmetics
Potatoes, tomatoes and chillies
Kept on jamming
- Rajesh Tripathi
"शोषड़"
विकल्प के अंतराल में
विकराल हो चुका है अब
जो कभी था सीमित
असीमित बन चुका है अब
जो आये उनको सवारने
खुद को सवारने लगे
उम्मीद थी जिनसे प्यार की
वही दुत्कारने लगे
उनके ही नाम पर कभी
मतलब निकालते हैं सभी
संसद में झूठी प्यार से
उनको पुकारते हैं कभी
तो गाड़ी की गन्दगी पर
उनको थप्पड़ जमाते हैं कभी
गर
कभी भी उनके बारे में
सोचा होता ,
क्या उनका भी कोई सपना हैं
क्या उनकी भी कोई ख़ुशी हैं
शायद ,
थी है नहीं
वो दब चुकी है
दुकानों की कपो प्लेटो के बीच
साहब के नास्ते के आस पास
ख़ुशी विलीन हो चुकी है
गाड़ी की चमक में
शायद यूं ही ये पंक्तियाँ
उभड़ आयी
बाल शोषड़ के उधेड़ बुन में
- राजेश त्रिपाठी
"ज़िन्दगी"
क्या ? जिंदगी का यही
वास्तविक रूप है
या इसका और भी कोई सरूप हैं
क्या ? जीने तक ही सिमित है
या जिंदगी सिर्फ
एक कड़ी ही हैं
जो मरने और जीने का
एहसास दिलाती है
या काल्पनिक मन की पुकार हैं
जिंदगी
ऐसा नहीं तो क्या फिर
तृप्त आत्मा की पुकारहैं
जिंदगी
या संसार रूपी पड़ाव की
दुकान हैं जिंदगी
जिसके दुःख सुख रूपी
ग्राहक हैं हम
जब भी जैसे भी
चाहे उथल पुथल मचाये
और चल दिए
गर
कुछ भी सोचा होता जीवनी दुकान पर
तो शायद
न बनती मन की उफान ये जिंदगी
- राजेश त्रिपाठी