ज़िन्दगी

    "ज़िन्दगी"

क्या ? जिंदगी का यही
वास्तविक रूप है
या इसका और भी कोई सरूप  हैं
क्या ? जीने तक ही सिमित है
या जिंदगी सिर्फ
एक कड़ी  ही हैं
जो मरने और जीने का
एहसास दिलाती है
या काल्पनिक मन की पुकार हैं
जिंदगी
ऐसा नहीं तो क्या फिर
तृप्त आत्मा की पुकारहैं
जिंदगी
या संसार रूपी पड़ाव की
दुकान हैं जिंदगी
जिसके दुःख सुख रूपी
ग्राहक हैं हम
जब भी जैसे भी
चाहे उथल पुथल मचाये
और चल दिए
गर
कुछ भी सोचा होता जीवनी दुकान पर
तो शायद
न बनती मन की उफान ये जिंदगी

- राजेश त्रिपाठी 

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