शोषड़
"शोषड़"
विकल्प के अंतराल में
विकराल हो चुका है अब
जो कभी था सीमित
असीमित बन चुका है अब
जो आये उनको सवारने
खुद को सवारने लगे
उम्मीद थी जिनसे प्यार की
वही दुत्कारने लगे
उनके ही नाम पर कभी
मतलब निकालते हैं सभी
संसद में झूठी प्यार से
उनको पुकारते हैं कभी
तो गाड़ी की गन्दगी पर
उनको थप्पड़ जमाते हैं कभी
गर
कभी भी उनके बारे में
सोचा होता ,
क्या उनका भी कोई सपना हैं
क्या उनकी भी कोई ख़ुशी हैं
शायद ,
थी है नहीं
वो दब चुकी है
दुकानों की कपो प्लेटो के बीच
साहब के नास्ते के आस पास
ख़ुशी विलीन हो चुकी है
गाड़ी की चमक में
शायद यूं ही ये पंक्तियाँ
उभड़ आयी
बाल शोषड़ के उधेड़ बुन में
- राजेश त्रिपाठी
विकल्प के अंतराल में
विकराल हो चुका है अब
जो कभी था सीमित
असीमित बन चुका है अब
जो आये उनको सवारने
खुद को सवारने लगे
उम्मीद थी जिनसे प्यार की
वही दुत्कारने लगे
उनके ही नाम पर कभी
मतलब निकालते हैं सभी
संसद में झूठी प्यार से
उनको पुकारते हैं कभी
तो गाड़ी की गन्दगी पर
उनको थप्पड़ जमाते हैं कभी
गर
कभी भी उनके बारे में
सोचा होता ,
क्या उनका भी कोई सपना हैं
क्या उनकी भी कोई ख़ुशी हैं
शायद ,
थी है नहीं
वो दब चुकी है
दुकानों की कपो प्लेटो के बीच
साहब के नास्ते के आस पास
ख़ुशी विलीन हो चुकी है
गाड़ी की चमक में
शायद यूं ही ये पंक्तियाँ
उभड़ आयी
बाल शोषड़ के उधेड़ बुन में
- राजेश त्रिपाठी

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