तुम

"तुम"
बड़े भोले हो तुम
मेरे दिल को टटोले हो तुम
मैं फिसल गया हूँ
जब भी बोले हो तुम
खींच लिया मुझे अपनी तरफ
पूछ लिया मैंने कैसे हो तुम
एक हलकी सी उदासी पर
बोल बैठा ये दिल
कहीं कोई कमी तो नहीं
फिर निराश क्यों हो तुम
छोड़ कर हर काम
सुबह दोपहर और शाम
मिलते हैं हम और तुम
झिझक पड़ता हूँ  मैं उनसे
जो तुम्हरी तरफ नजरें
उठाने की कोशिश करते हैं
क्यों की सहानभूति हैं
मुझे तुम्हारे प्रति
पर्दे के उस पार की कहानी से
जो अक्सर बोलते हो तुम
अजीब सा... ये क्या असीम प्यार को
ठुकरारा रहे हो तुम
उम्मीद नहीं थी...
काले दिल के हो तुम

- राजेश त्रिपाठी

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