गरीबी

"गरीबी"

उसके साये मेरे आस पास
भटकने लगे
हर पल हर समय
वह मुझे दिखायी
पड़ने लगी
मुझको एक अजीब सा एहसास
होने लगा
शायद वह मेरी तरफ
खींची आ रही थी
या यूँ कहूं
मैं उसके तरफ बढ़ने लगा
तो शायद कोई भेद नहीं होगा
मुझे चिंता होने लगी
आने वाले दिनों की
क्या ? मैं उसी तरह
रह पाउँगा
शायद नहीं
मेरे पास तो बच्चे है
मृद भाषी पत्नी हैं
क्या ? ये लोग झेल पायंगे
इस बढ़ी चली आ रही गरीबी को
या रो पड़ेंगे
क्या ? उनका रोना सही होगा
शायद नहीं
तो क्या और कोई विकल्प है
हाँ समझौता और कर्मनिष्ठा

- राजेश त्रिपाठी 

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